LAW'S VERDICT

प्यारे मियां बोला- 6 साल से जेल में हूँ, पैसों की बेहद तंगी, हटाई जाए 20 लाख जमा करने की शर्त


वकील की गैरहाजिरी पर हाईकोर्ट ने कहा-  मुकदमे में दिलचस्पी नहीं दिख रही, शर्त हटाने की याचिका हुई खारिज 

जबलपुर। नाबालिग लड़कियों से दुष्कर्म करने के आरोप में वर्ष 2019 में गिरफ्तार हुए प्यारे मियाँ की मुश्किलें काम होने का नाम नहीं ले रही है। भोपाल के श्यामला हिल्स थाना क्षेत्र में दर्ज 60 लाख रुपये के कथित गबन और जालसाजी के मामले में मप्र हाईकोर्ट ने प्यारे मियां और उसकी पत्नी तनवीर फातिमा की याचिका खारिज कर दी है। जस्टिस बीपी शर्मा की अदालत ने कहा है कि वकील की लगातार गैरहाजिरी से लग रहा कि आवेदकों की इस मुकदमे में अब दिलचस्पी नहीं है, इसलिए उसे खारिज किया जाता है। प्यारे मियां का कहना था  कि 17 मार्च 2021 को जमानत मिलने के बावजूद ₹20 लाख जमा करने की शर्त के कारण वह अब तक जेल से बाहर नहीं आ सका। अपनी आर्थिक तंगी का हवाला देकर उसने 20 लाख जमा करने की शर्त को हटाने की मांग हाईकोर्ट से की थी।

60 लाख के गबन का है आरोप 

मामला श्यामला हिल्स थाने में प्यारे मियां के खिलाफ IPC की धारा 420, 406, 467, 468, 471 और 120-B के तहत दर्ज FIR से संबंधित है। प्यारे मियां पर आरोप है कि 2011 में सोसायटी परिसर में एयरटेल टॉवर लगाने के लिए उसने अपने पत्नी के साथ मिलकर फर्जी सोसायटी बनाई और जालसाजी से समझौता करके करीब ₹60 लाख के गबन किया।

हाईकोर्ट से शर्त के साथ मिली थी जमानत 

हाईकोर्ट ने 17 मार्च 2021 को धारा 439 CrPC के तहत प्यारे मियां को जमानत दी थी। अदालत ने माना था कि आरोपी 16 जुलाई 2020 से जेल में है। चार्जशीट दाखिल हो चुकी है। ट्रायल लंबा चलेगा और उसकी पत्नी तनवीर फातिमा पहले ही जमानत मिल चुकी है। हालाँकि प्यारे मियां को जमानत देते हुए हाईकोर्ट ने यह शर्त रखी थी कि उसको ₹20 लाख जमा करना होंगे। जमानत की इस शर्त को हटाने प्यारे मियाँ ने पिछले आदेश मे संशोधन की मांग करके यह मामला 29 नवंबर 2025 को हाईकोर्ट में दाखिल किया था। उसका कहना है कि वह 72 वर्ष का है। आर्थिक संकट से जूझ रहा है। परिवार में कोई भी ₹20 लाख जमा करने की स्थिति में नहीं है और जमानत मिलने के बावजूद 6 साल से जेल में है। लिहाजा ₹20 लाख जमा करने की शर्त हटाई जाए और निजी मुचलके पर रिहा किया जाए। लगातार दो पेशियों से आरोपियों की ओर से किसी वकील के हाजिर न होने पर अदालत ने माना की आवेदक अब इस मुकदमे में दिलचस्पी खो चुके हैं, इसलिए उनकी याचिका ख़ारिज की जाती है। 

हाईकोर्ट का आदेश देखें  MCRC-55729-2025

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